इस करुणा कलित हृदय में…

स्वर्ग का द्वार सम्मुख था, पर यह मरीचिका ही तो थी। अब लगता है यह एक अनंत यात्रा है, जिसमें बस पैरों के छाले और बिवाइयां हैं और जिसके इस जन्म में पूर्ण होने की कोई सम्भावना नहीं…

मेघाच्छन्न था आकाश, तृषित धरा थी प्रतीक्षा में, पर बरसीं तो चार बूंदें; तृषा को और भी जगा गयीं, दाह को और भी Continue reading “इस करुणा कलित हृदय में…”

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छाप तिलक सब छीनी रे….

हृदय वीणा का कोई तार जो अब तक अनछुआ था, कोई उसे छूकर गया है और तब से संगीत के एक अजस्र निर्झर को देह-मन में झरते हुए महसूस करता हूँ।

चित्त सागर का शांत अकंप जल जो अब तक ठहरा हुआ था, कोई उसे भंवर देकर गया है और तब से इसी में डूबता हूँ, उतराता हूँ और डूब ही जाना चाहता हूँ……. क्योंकि Continue reading “छाप तिलक सब छीनी रे….”

सहितस्य भावः साहित्यं

जब किसी सौंदर्य राशि को अभिमंत्रित सा देखता रह गया था तब मन में अनायास ही कौंधी थी कोई कविता की पंक्ति और लगा था कि मैंने उस मूर्त छवि को अमूर्त शब्दों में बांधकर मन में सहेज लिया है, हमेशा के लिए|

ऐसा ही कितना कुछ अनुभव करने के बाद अब यह सोचता हूँ कि किसी ने साहित्य की परिभाषा कितनी सटीक दी है- ‘सहितस्य भावः साहित्यं’; अर्थात जिसका उद्देश्य साथ होना है वही साहित्य है| अगर इस ‘साथ’ की परिभाषा को निज व्यष्टि और साहित्य में रची गयी समष्टि के बीच रखकर देखूं Continue reading “सहितस्य भावः साहित्यं”

सतपुड़ा के घने जंगल……

 

इन्हीं जंगलों को देखकर भवानीप्रसाद मिश्र जी ने लिखा था-

सतपुड़ा के घने जंगल *
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

झाड ऊँचे और नीचे,
चुप खड़े हैं आँख मीचे, Continue reading “सतपुड़ा के घने जंगल……”

‘ज्या’ से ‘sine’ तक

आज से 1200 वर्ष पूर्व, 8वीं शताब्दी में अरब देश में गणित ज्योतिष के एक भारतीय ग्रंथ का संस्कृत से अरबी में अनुवाद किया जा रहा था कि एक शब्द पर अनुवादकों को ठहर जाना पड़ा……

ध्यान रहे कि 8वीं शताब्दी वह समय था जब भारत को विश्वगुरु जैसे विशेषणों से विभूषित किया जाता था। आज ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में नई खोजें और संकल्पनाएं हमारे यहां आयातित होती हैं, लेकिन तब स्थिति इसके उलट थी। तब भारत ही वह केंद्र था जहां से भौतिक वस्तुओं के निर्यात के साथ-साथ, नवीन सिद्धांत और संकल्पनाएं भी दूर-दूर तक प्रसार पाती थीं। भारत से अरब और फिर अरब से यूरोप – इसी मार्ग से भारतीय ज्ञान-विज्ञान का वैश्विक प्रसार हुआ।

आइए अब हम फिर से वही सूत्र पकड़ते हैं जो ऊपर पहले अनुच्छेद में छोड़ आए हैं, जहां अरब देश के अनुवादकों को ठहर जाना पड़ा था…… Continue reading “‘ज्या’ से ‘sine’ तक”

निराला: ‘राम की शक्तिपूजा’ और ‘तुलसीदास’

पिछले कुछ दिनों में यूट्यूब पर कई बार एक छोटी सी बच्ची सूर्यगायत्री की गायी हुई तुलसीदास कृत रामस्तुति ‘श्री रामचंद्र कृपालु भज मन हरण भवभय दारुणं’ सुनी| आप भी सुनें, अच्छा लगेगा, लिंक यह रहा – https://youtu.be/MyNSOu-Fl-k इस छोटी सी बच्ची में ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा है| लेकिन यह पोस्ट किसी और कारण से लिख रहा हूँ| इस भजन ‘श्री रामचंद्र कृपालु भज मन……’ को जब भी सुनता हूँ, मुझे मेरे प्रिय कवि निराला जी याद आते हैं| यही वह भजन है, जिसने निराला के मन में सुप्त साहित्य संस्कार को जाग्रत Continue reading “निराला: ‘राम की शक्तिपूजा’ और ‘तुलसीदास’”

आओ सहेली…..

मनस्वी - अदिति
मनस्वी और अदिति

इस मनभावन छवि में गलबहियां किये दो बच्चियां खड़ी हैं। बाएं, मेरी भतीजी मनस्वी टीशर्ट पहने हुए और दाएं, मेरी भांजी अदिति फ्रॉक पहने हुए। सामने केक देखकर आप समझ सकते हैं कि अवसर इन दोनों में से किसी एक के जन्मदिन का है। तो बता दें कि जन्मदिवस था अदिति का। इस 4 मार्च को अदिति चार वर्ष की हो गयी, केक पर मोमबत्तियां भले केवल  Continue reading “आओ सहेली…..”