विदा का क्षण, समझ में नहीं आता…

विदा का क्षण… लरजती उंगलियों का स्पर्श विलग जाना… रोके हुए अश्रु जल का छलक जाना…

विदा का क्षण… क्षण भर भी अधिक देर तक ठहरता नहीं… फिसलता है जैसे हाथों से रेत… जैसे किनारे से दूर जाती हुई नाव का दृष्टि से ओझल होते जाना… जाने कब हो फिर इस तीरे…

विदा का क्षण… इतना बोझिल होता है कि Continue reading “विदा का क्षण, समझ में नहीं आता…”

Advertisements

सीधी है भाषा बसन्त की!

वसंत आ गया है… नव वसंत आया है… यह ‘नव’ विशेषण क्यों? वैसे वसंत है ही पल्लवन, पुष्पन, सर्जन की ऋतु; इसलिए ‘नव’ विशेषण के पृथक उल्लेख की आवश्यकता नहीं, लेकिन जब मन का मौसम वासंती हो तो यह सब तर्क-वितर्क भला क्यों!

शीत ने सब दिशाएं जमा दी थीं। वसंत ने उस जम गयी प्रकृति को फिर पिघला दिया है| वह थमा, ठिठका, जमा हुआ सौन्दर्य फिर खिल गया है, खुल गया है, बह चला है| वह सौंदर्य राशि वासंती बयार में घुल घ्राण से प्राण में Continue reading “सीधी है भाषा बसन्त की!”

आधुनिक युग के दो ऋषि

वर्ष 1900…. यूरोप के आधुनिकतम एवं समृद्धतम नगर पेरिस में एक वैश्विक प्रदर्शनी Exposition Universelle का आयोजन हो रहा था| 19वीं शताब्दी के अतीत और 20वीं शताब्दी के भविष्य की वयःसंधि पर आयोजित हुई इस प्रदर्शनी में ज्ञान-विज्ञान का शायद ही कोई क्षेत्र अछूता रह गया था| डीजल इंजन, सवाक (बोलती हुई) फिल्मों, स्वचालित सीढ़ियों जैसे आविष्कारों एवं नवाचारों का यहाँ प्रदर्शन हुआ, जिन्होंने 19वीं और 20वीं शताब्दी के बीच सदियों का अंतर पैदा कर दिया Continue reading “आधुनिक युग के दो ऋषि”

डुबोया मुझको होने ने……

(1)

मैं द्वीप हूँ एकाकी, निर्जन, निःशब्द, अनदेखा, अनछुआ। मैं धारा बनकर बह निकलना चाहता हूँ, सजल, सरस, संगीतमय| लेकिन कोई आता नहीं जो मुझे अपने प्रवाह में चलायमान कर दे, मुझे बहा ले जाए। कविवर अज्ञेय ने कहा है- “हम हैं द्वीप/हम धारा नहीं हैं/…../हम बहते नहीं हैं/क्योंकि बहना रेत होना है/हम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं।” किन्तु यह ‘रहना’ ही तो मैं चाहता नहीं Continue reading “डुबोया मुझको होने ने……”

स्मृति प्रांतर के बीहड़ में….

स्मृतियों के सघन वन में विचरता हूँ। पात-पात पर स्मृतियों के गुंजलक सी कितनी ही रेखाएं खिंची हुई हैं। इनमें से हरेक कालरेख में कभी मैं बहा था, डूबा था, तिरा था। जब-तब अनजाने ही विचरने लगता हूँ इस अतीत के बीहड़ में, और देखता हूँ कि कितना ही कुछ है जिससे मैंने स्वयं को मुक्त मान लिया था, लेकिन मुक्त हुआ कहाँ था; मुक्ति क्या इतनी सहज है! वे लहरिल वल्लरियाँ मुरझा भले चली हों, पर Continue reading “स्मृति प्रांतर के बीहड़ में….”

इस करुणा कलित हृदय में…

स्वर्ग का द्वार सम्मुख था, पर यह मरीचिका ही तो थी। अब लगता है यह एक अनंत यात्रा है, जिसमें बस पैरों के छाले और बिवाइयां हैं और जिसके इस जन्म में पूर्ण होने की कोई सम्भावना नहीं…

मेघाच्छन्न था आकाश, तृषित धरा थी प्रतीक्षा में, पर बरसीं तो चार बूंदें; तृषा को और भी जगा गयीं, दाह को और भी Continue reading “इस करुणा कलित हृदय में…”

छाप तिलक सब छीनी रे….

हृदय वीणा का कोई तार जो अब तक अनछुआ था, कोई उसे छूकर गया है और तब से संगीत के एक अजस्र निर्झर को देह-मन में झरते हुए महसूस करता हूँ।

चित्त सागर का शांत अकंप जल जो अब तक ठहरा हुआ था, कोई उसे भंवर देकर गया है और तब से इसी में डूबता हूँ, उतराता हूँ और डूब ही जाना चाहता हूँ……. क्योंकि Continue reading “छाप तिलक सब छीनी रे….”